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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

हाइकू

१
आया सावन 
नदी नाले जवान 
केंचुए उगे |


२
भरी जवानी 
सावन बरसता 
पिया से दुरी |


३
नदी का शोर 
मुरली मनोहर 
झूमता मोर |


४
श्याम जलध
नदियाँ उफनती 
धरा गगन |


५
साजन दूर 
पहला ये सावन 
मैं मजबूर |


६
भोर मंदम
रोता दिवस आया 
सांझ कीचड़ |
७
धरा नहाये 
रोम है हरियाये
जख्म भी खाये|


८
निर्झर शोर
 मास काला बेदर्द 
 हिये न जोर |


९
बाल खेला 
जवानी खूब सोया 
जीवन खोया |


१०
डडु संगीत 
रिमझिम है ताल 
नाचे बाल |

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

हाइकू

झरना झर
दिन रात बहता
पानी ठहरा
जंगल बल
जलता जाय फिर
बारिश खाता
 
किताबें भरी
पुस्तकालयों में
हैं धूल खाती

  महंगे लेप
बदल न सकते 
असली रंग

पौधे बहुत
आँगन फुलवारी
सजावट को

  निश्चित नहीं
आएगा वापस वो
गया सुबह 

मर चूका है
इंसान भीतर
आदमी तेरे

रहना जिन्दा
जिंदगी में करले 
काम  जिन्दों के

जाता कहाँ है
फेर कर मुंह को 
करके खता

रह जाएगा
ये स्वर्ण खजाना
धारा यहीं पे