बुधवार, 27 अप्रैल 2011

कविता

सिर्फ तुम्हारी 

बैठता  हूँ जब जब 
इंतजारमें मैं तुम्हारे
श्रृंगार का सभी सामन लिये
तुम लाख बुलाने पर भी
नहीं आती तो नहीं आती | 
जब आती हो तो आ जाती हो 
कभी भी कहीं भी अकेले में
मेले में या झमेले में |
झकझोर कर
अपने नरम नरम हाथों से
कन्धों को मेरे कहती हो
  समेट लो मुझे बाहों में अपनी
और करो मेरा श्रृंगार 
जी भर छंद उपमा
और अलंकार से
मैं तुम्हारी हूँ
सिर्फ तुम्हारी  |
                                     अनंत आलोक 

2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय साथिओं,
    आओ साहित्य की बातें करें| कुछ अपनी, कुछ उनकी सबकी बातें आम आदमी की बातें |

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